देखी नहीं जाती
ग़ज़लइतनी सारी बेईमानी, देखी नहीं जाती
तेरी आंखों की परेशानी, देखी नहीं जाती
गुजार दी हैं मैंने मुद्दतें अंधेरों में यारों
अब उजालों की निशानी, देखी नहीं जाती
कुछ भी, कैसा भी देखा जा सकता, मगर मुझसे
तेरी झुकी ये पेशानी, देखी नहीं जाती
दिल में आज कोई और है, कल कोई और
इश्क में इतनी भी मनमानी, देखी नहीं जाती
पड़ोसी भूखा है और तुम्हें नींद आ जाती
आदमियत की ये अर्ज़ानी, देखी नहीं जाती
वो चाहती है पीना सारे दरिया का पानी
इन नदियों की ये नादानी, देखी नहीं जाती